रिश्ते में मेरे अधिकार क्या हैं?

हर व्यक्ति अपने रिश्ते में सुरक्षा, सम्मान और हिंसा या नियंत्रण से आज़ादी का हक़दार है।

हर किसी को सुरक्षा, सम्मान और हिंसा से मुक्त जीवन का हक़ है। क़ानून कई तरह की सुरक्षा देता है, लेकिन क़ानूनी या पुलिस से मदद लेना मुश्किल और भारी लग सकता है। अपने अधिकारों को जानना पहला मज़बूत क़दम है, और जब आप तैयार हों तो सहयोग उपलब्ध है।

अपने अधिकार जानना बहुत ताक़तवर होता है, भले ही आप तुरंत क़ानूनी कार्रवाई करने की योजना न बना रही हों। भारत का क़ानून कई तरह की हिंसा को पहचानता है और सुरक्षा के विकल्प देता है, लेकिन सिस्टम धीमा या मुश्किल हो सकता है। जानकारी रखने से आप:

  • पहचान सकती हैं कि हिंसा कब हो रही है
  • यह तय करने में सुरक्षित फ़ैसले ले सकती हैं कि कब और कौन-सा क़दम उठाना है
  • संकट आने से पहले भरोसेमंद लोगों, NGOs या सेवाओं तक पहुँच सकती हैं

अकेली या बेबस महसूस करने से बच सकती हैं
भले ही आप कभी क़ानूनी सिस्टम का इस्तेमाल न करें, अपने अधिकार जानना आपको और दूसरों की सुरक्षा में मदद करता है।

हाँ। गृह हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 मानता है कि हिंसा सिर्फ़ शारीरिक नहीं होती — यह यौन, मानसिक, ज़बानी, आर्थिक या डिजिटल भी हो सकती है।
उदाहरण:

  • लगातार गालियाँ, धमकियाँ या अपमान करना
  • कहाँ जाना है इस पर रोक लगाना या दोस्तों और परिवार से अलग करना
  • पैसों तक पहुँचने से रोकना
  • बिना सहमति के सेक्स के लिए दबाव डालना

शादी में भी जबरन सेक्स करना हिंसा है। भारत में वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक अपराध नहीं माना गया है, लेकिन गृह हिंसा अधिनियम इसे यौन हिंसा मानता है। इसका मतलब है कि आप सिविल उपाय ले सकती हैं, जैसे प्रोटेक्शन ऑर्डर, घर में रहने का हक़, आर्थिक मदद और मानसिक नुकसान का मुआवज़ा।

गृह हिंसा अधिनियम के तहत आपको ये अधिकार मिल सकते हैं:

  • प्रोटेक्शन ऑर्डर ताकि हिंसक पार्टनर आप या आपके प्रियजनों से संपर्क न कर सके
  • रेज़िडेंस ऑर्डर ताकि आप अपने घर में रह सकें
  • आर्थिक मदद: मेडिकल खर्च, आय का नुकसान या अन्य नुक़सान की भरपाई
  • बच्चों की कस्टडी का हक़

मानसिक और भावनात्मक नुक़सान का मुआवज़ा
ये सुरक्षा शादीशुदा, साथ रह रही या अलग रह रही सभी औरतों के लिए हैं।

  • दहेज: दहेज माँगना ग़ैरक़ानूनी है। इस पर दहेज निषेध अधिनियम, 1961 और IPC की धारा 498A के तहत कार्रवाई हो सकती है।
  • स्ट्र्रीधन: शादी में मिले गहने, नक़द या कीमती सामान सिर्फ़ आपके हैं। किसी और का उन पर हक़ नहीं है।
  • संपत्ति: बेटी होने के नाते, शादीशुदा हो या नहीं, आपको माता-पिता की संपत्ति में बराबर का हक़ है (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 2005 के तहत)।

गर्भावस्था: शादीशुदा हों या न हों, आपको सुरक्षित और क़ानूनी गर्भपात का अधिकार है (गर्भपात अधिनियम, 1971, संशोधित 2021)।

धमकाना, निजी फ़ोटो या मैसेज से ब्लैकमेल करना, या सोशल मीडिया अकाउंट्स को कंट्रोल करना — ये सब हिंसा के रूप हैं। रिपोर्ट करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन सबूत सुरक्षित रखना (स्क्रीनशॉट, रिकॉर्डिंग, मैसेज) पहला मज़बूत क़दम है। आप साइबर क्राइम हेल्पलाइन, स्थानीय पुलिस स्टेशन या NGO से मदद ले सकती हैं।

हाँ। अगर आप शादीशुदा हैं, तो आप तलाक़ ले सकती हैं — आपसी सहमति से या कानूनी कारणों पर, जैसे क्रूरता, परित्याग या मानसिक नुकसान। अगर आप लिव-इन रिलेशनशिप में हैं और वह असुरक्षित या नियंत्रित महसूस हो रहा है, तो आप उसे भी ख़त्म कर सकती हैं। वकील या NGO आपको सही विकल्प, योजनाएँ और सेवाएँ बताने में मदद कर सकते हैं।

कोई बात नहीं। आपको तुरंत कार्रवाई करने की ज़रूरत नहीं है। अपने अधिकार जानना ही पहला मज़बूत क़दम है। कई सर्वाइवर्स को यह भी मददगार लगता है कि वे पहले से भरोसेमंद लोगों या सेवाओं — जैसे NGOs, पड़ोसी या दोस्तों — से जुड़कर रखें।

क़ानूनी सिस्टम धीमा और कभी-कभी निराश करने वाला हो सकता है। हर महिला को लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटीज़ एक्ट के तहत मुफ़्त कानूनी मदद का अधिकार है, लेकिन हक़ीक़त में यह हर जगह समान रूप से उपलब्ध नहीं है। NGOs और महिलाओं के संगठन अक्सर आपको ज़्यादा भरोसेमंद मदद से जोड़ सकते हैं।

याद रखें: आप अकेली नहीं हैं। आपके पास विकल्प हैं। और आपके पास आज़ादी, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का पूरा अधिकार है।