अगर आपको समझ नहीं आ रहा कि किस पर भरोसा करें या किससे कहें, तो यह बिल्कुल ठीक है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि जिसको आप बताएं, वो कोई ऐसा हो जिसके साथ आप सुरक्षित महसूस करती हों।
याद रखें, अगर पहली बार जिसको आपने बताया उसने मदद नहीं की, तो आपका आहत महसूस करना स्वाभाविक है। लेकिन इससे रुकिए मत। किसी और से बात करने की कोशिश कीजिए। आप अकेली नहीं हैं और मदद उपलब्ध है।
आप हेल्पलाइन पर गुमनाम रहकर भी मदद ले सकती हैं। अगर आप किसी दोस्त, परिवार के सदस्य या सहकर्मी को बताने का सोच रही हैं, तो तैयार रहें कि उनकी प्रतिक्रिया सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी। कुछ लोग दयालुता और समझ दिखा सकते हैं, जबकि कुछ असहज हो सकते हैं या आपकी बात को हल्के में ले सकते हैं। उन्हें भी आपकी बात समझने और सोचने में समय लग सकता है। याद रखें, उनकी प्रतिक्रिया आपके सच की परछाई नहीं है। यह भी सोचें कि अगर कोई ग़लत या अनुपयोगी बात कहे, या तुरंत न समझे, तो आप क्या कहना चाहेंगी।
जब आप किसी भरोसेमंद इंसान को चुन लें और खुद को हर तरह की प्रतिक्रिया के लिए तैयार कर लें, तो अपनी सुरक्षा पर भी ध्यान दें। हो सकता है आप दोस्तों और परिवार से अलग-थलग हों, या आपका फ़ोन और मैसेज आपके पार्टनर द्वारा देखे जा रहे हों। ऐसे में आप ये तरीक़े अपना सकती हैं:
अगर आपको शुरुआत करने में मुश्किल हो रही है, तो ये वाक्य मदद कर सकते हैं:
आपको अलग-अलग भावनाएँ महसूस हो सकती हैं — राहत, डर, थकान, उदासी, या हल्कापन। हिंसा के बारे में बताना बहुत साहस की बात है और भावनात्मक रूप से थका देने वाला भी हो सकता है। अपने साथ नर्मी बरतें।
अगर संभव हो, तो थोड़ा आराम करें या कुछ ऐसा करें जिससे आपको सुकून मिले। आप इन सहायताओं तक भी पहुँच सकती हैं: